2 Jun 2015

जवानों में भरोसा, एक दुसरे की इज्ज़त और इत्तेहाद की लगन कैसे बड़ाई जाए?

जवानो में भरोसा, एक दुसरे की इज़्ज़त और इत्तेहाद की लगन कैसे बढ़ाई जाए?

हमारे पालनेवाले ने हमें एक दुनिया बनाकर उसमे एक साथ रहने के लिए पैदा किया. दुनिया इतनी बेहतरीन बनाया की इंसान इसे छोड़ने के लिए तैयार ही नहीं होता. कितनी भी उम्र हो जाए, इंसान को यहाँ थोड़े दिन और रहने का दिल करता है. लेकिन उसके उलट, अगर इसी दुनिया में हमारे किसी के साथ रिश्ते ख़राब हो जाए, या झगडा हो जाए तो यही दुनिया हमें काटने दौड़ती है. अगर झगडा किसी करीबी से हो तो हालात और ख़राब बन जाते है.

हमारी ज़िन्दगी को सुख और चैन से गुज़ारने में जो पॉइंट सबसे इम्पोर्टेन्ट है वो है लोगों के साथ मिल-जुल कर रहना. घर वालो के साथ साथ बहार वालो के साथ भी अच्छे अखलाक से पेश आना; फिर वो हमारे मज़हबो मसलक के हो या बहार वाले. 

28 May 2015

हम दूसरों से इतनी नफरत करना कैसे सिख गए?

माहे रजब और शाबान की आमद हमारे लिए खुशियों का बाईस होते है जिसमे हम अपने इमामो और अवलिया की विलादत का जश्न मानते और उनसे करीब होने की कोशिश करते है. इस मकसद को पूरा करने के लिए मोमेनीन अलग अलग किस्म के तरीके अपनाते है जिससे सवाब भी मिले और मोमेनीन आपस में एक दुसरे के करीब भी आए ताकि पूरी कौम खुदा के करीब हो सके. 

कुछ लोग इमाम सादिक (अ) के नाम पर कुंडे की नज़रों नियाज़ का एहतेमाम करते है, तो कुछ इन मुबारक महीनो की शबे जुमा में दुआ का खास प्रोग्राम रखते है; कुछ लोग आइम्मः (अ) से मंसूब जश्न करते है जिनमे आइम्मा (अ) की शान में कसीदे पढ़े जाते है और कुछ लोग ग़रीबो को खाना खिलाते और खैरात करते है. इन सब का मकसद आइम्मा (अ) की ज़ात से कुरबत है जो हमें अल्लाह के करीब ले जाती है; और अगर इस कुरबत का एक हिस्सा भी हमें नसीब हो जाए तो हम अपनी ज़िन्दगी में आइम्मा (अ) की सीरत पर चलने के लिए आमादा हो जाते है, जो हमें इस दुनिया और आखिरत में कमियाबी दिलाने में सबसे कारगर चीज़ है.

इसी सिलसिले में पिछले दिनों एक महफ़िल, जो आइम्मा (अ) की शान में राखी गई थी, उसमे जाने की सआदत नसीब हुई. चूँकि महफ़िल आइम्मा (अ) के नामे से रखी गई थी, ज़ेहन में था की आइम्मा (अ) के सिलसिले में कसीदे और कलाम पेश किये जाएगे. लेकिन जैसे ही शोअरा ने अपने कलाम पेश किये, वो या तो किसी दुसरे मसलक वालो पर लानत मलामत कर रहे थे या खुद अपने भाईयों पर, जिनसे किसी क़िस्म का नज़री इख्तिलाफ है, उनपर तंज़ करते दिखाई दिए. अगर कोई शाएर इन तंजिया शेर से हटकर कोई और अशआर पढ़ देता तो इतनी दाद / वाह-वाही नहीं मिलती जितनी तंजिया शेरो पर मिल रही होती.

इस वकेये को बताने का मकसद यह है कि हमें अहसास हो के हमारी कौम किस रास्ते पर जा रही है? क्या दीन हमें यह सिखाता है कि हम अपनी मजलिसो महफ़िल में दुसरो की ग़ैर मौजूदगी में उन पर लानतान करे और तंज़ करके वाहवाही बटोरे? किस आइम्मा (अ) ने इस तरह की महफ़िल का एहतेमाम किया?

इसके बरखिलाफ हमें आइम्मा (अ) की सीरत से दीन का दूसरा चेहरा दिखाई देता है; और वो है रहमदिली और भाईचारे का. आइम्मा (अ) दीगर मज़हब ओ मसलक के लोगो के लिए खुसूसी दर्स रखते थे और उन्हें मज़हबी और समाजी बातो की चीज़ें बताते थे. कभी किसी आइम्मा (अ) ने किसी दुसरे मज़हब वालो (इसाई, यहूदी, पारसी, वगैरह) या किसी दुसरे मसलक वालो (सुन्नी, बोहरी, इस्माइली, वगैरह) को तंज़ या उसकी ग़ैर मौजूदगी में उसके खिलाफ ऐसे लहजे में बात नहीं की जो अगर वो सामने मौजूद होता तो उसे बुरी लगती.

अगर हममे दुसरे मज़हबो मसलक के लोगो को शिअत की तरफ लाने की अस्ल तड़प मौजूद है तो फिर उसके साथ बैठ कर एक दोस्ताना माहोल में बात हो. अगर वो बहस ओ मुबहेसे के लिए हमें बुलाता है तो फिर हमें उसके लिए भी तैयार रहना चाहिए. न खैर की हम सीधे लानत मलामत करके अपना दामन झाड ले.

आए दिन व्हाट्स आप पर जॉब्स / नौकरी के लिए भी मेसेज आते है; और हमारे भाई उसमे भी लिखते है की सिर्फ “मोमेनीनको फॉरवर्ड करे. ये किस किस्म की अहमकाना हरकत है? क्या इस्लाम ने दुसरे मज़हबो मसलक के लोगो के साथ इस तरह जीने का तरीका सिखाया है? क्या हमने नहीं पढ़ा या मजलिसो में सुना की एक शामी शख्स इमाम हसन (अ) की खिदमत में हाज़िर हो कर उन्हें बुरा भला कहने लगा; इमाम (अ) ने उस पर ना ही लानत मलामत की ना उसके वालेदैन पर तोहमत लगाई; बल्की इमाम (अ) ने उस से अच्छे लहजे में उसकी परेशानिया पूछी और उसके साथ अच्छा बर्ताव किया; जिसका असर ये हुआ की वो इमाम (अ) के चाहने वालो में से हो गया.

यहाँ पर हमें देखना होगा की कैसे और कब से हमारी कौम इस रास्ते पर चल पड़ी हैं? दस साल पहले ऐसे हालात नहीं थे. और ना ही कौम में इतना फिर्क़रापस्ती थी. जश्न और महाफिलों में आइम्मा (अ) की सना और तारीफ की जाती थी, ना की दूसरी कौमो को बुरा भला कहा जाता था. 

अगर हमारे बुज़ुर्ग मराजे को देखा जाए तो वो भी दूसरी कौमो के साथ मिल कर रहने के लिए कहते है और उनके मुक़द्देसात की तौहीन से मना करते है. अगर मकामी उलेमा से कांटेक्ट करे तो वो भी दूसरी कौमो के साथ मिल-जुल कर रहने को तरजीह देते है और बुरा भला कहने से मना करते है. बहोत से उलेमा तो अहले सुन्नत उलेमा के साथ उनकी तंजीमो में प्रेसिडेंट और सेक्रेटरी की हैसियत भी रखते है. फिर सवाल ये उठता है की कौम क्यों इस लड़ाई झगडे के फितने में पड़ रही है?

करीब से देखने पर पता चलता हैं की कुछ लोग ज़ईफ़ और कमज़ोर हदीसे ला कर अवाम में आम कर रहे है जो फिरका परस्ती की तरफ जोर देती है. इस किस्म की हदीसे सोशल मीडिया और घरों में होने वाली क्लास्सेस के ज़रिये अवाम में फैलाई जा रही है जो की आइम्मा (अ) और हमारे ओलेमा की सीरत के सख्त खिलाफ है.

इतना ही नहीं, एक फिक्ही सवाल जवाब के सेशन में एक अमामे वाले मौलाना से जब सवाल किया गया की क्या हम ग़ैर मुस्लिम को ब्लड डोनेट कर सकते हैं या नहीं? उन्होंने जवाब दिया की बिलकुल नहीं कर सकते. जब अवाम ने एतेराज़ जताया की एक इंसान हमारे सामने मर रहा है तो किस तरह उसे मरने दे? क्या इस्लाम इसकी इजाज़त देता है? क्या हमारे सामने ऐसे वाकेआत नहीं है जिसमे आइम्मा (अ) ने मरते हुए लोगो को पानी पिला कर उनकी जान बचाई है? इन सब सवालो के बाद वो मौलाना ने अपना रुख थोडा बदला और कहा की इस नियत से ब्लड दे की ये किसी मोमिन की जान बचाने के काम में आएगा. 

जब ज़ाकेरिन इस तरह की बाते अवाम में कर रहे है और अपनी मजलिसो को फिरका परस्ती का जरिया बना रहे है जिसमे दुनिया में हो रहे क़त्लो गारत का ज़िम्मेदार आम सुन्नी को ठहराते है, क्या ये सही है? आखिर सुन्नी के खिलाफ नफरत भरने में इनका क्या मकसद है? क्या ये नहीं चाहते की हम किसी मुस्लिम मोहल्ले में रहे या किसी मुस्लिम होटल में जा कर खाना खाए? ऐसा क्यों होता है की यही ज़ाकिर को जब बाहर खाना खाना होता है तो उसी सुन्नी की होटल की तलाश करता है जिसे थोड़ी देर पहले अपनी मजलिस में बुरा भला कह रहा था.

आज ये हमारी कौम के ज़िम्मेदार बुजुर्गो और ओलेमाओ का फ़रीज़ा है की जवानों का ख्याल रखते हुए कुछ ठोस क़दम उठाए ताकि इस तरह की फिरका परस्ती कौम में आम ना होने पाए. जश्न और महाफिल में आइम्मा (अ) की मोहब्बत पर बात हो ना की दूसरी कौमो पर लानत मलामत. और हमारी मजलिसे भी ऐसे एबो से पाक ओ पाकीज़ा रहे. आइम्मा (अ) और बुज़ुर्ग उलेमा की सीरत पाक दामनी और भाई चारे वाली सीरत है, न की फिरका परस्ती की सीरत. 

हमारे पांचवे और छ्टे इमामो (अ) के मदरसों में शियों से ज्यादा अहले सुन्नत और ग़ैर मुस्लिम बैठते थे. सुन्नियो के सबसे बड़े मुजतहिद अबू हनीफा, इमाम शाफ  और इमाम मालिक हमारे इमामो (अ) के शागिर्द रह चुके है. क्यों हमारे इमामो (अ) ने इन्हें अपने दरसो से बाहर नहीं किया और इन्हें अपना इल्म लेने दिया? इमाम (अ) चाहते तो इन्हें तंज़ और लानत कर के बाहर कर सकते थे, लेकिन इमाम (अ) ने ऐसा नहीं किया. यही सीरत हमें भी अपनानी होगी.

हमें चाहिए की आइम्मा (अ) और उलेमा की सीरत पर चलते हुए हक और अम्न का रास्ता अपनाए न की फिरका परस्ती और फितना वारीयत का. अल्लाह से दुआ करते है की हमारी कौम के हर एक फर्द को सीरत ए आइम्मा (अ) पर चलने की तौफीक अता करे और अम्न का माहोल हर तरफ मुहैय्या करे. 

इलाही अमीन

तहरीर: अब्बास हिंदी

12 May 2015

13 rajab ka juloos, masla-e-zainabia aur qaum ke jawaan - Roman



13 rajab ka juloos, masla-e-zainabia aur qaum ke jawaan




Agar hame kisi qaum ke zinda ya murda hone ki jaach karni hai to dekhna hoga ki uske jawan kin muddo ko le kar hassasiyat dikh rahe hai. Agar muaashre me jin points par baat chal rahi hai wo qaum ke bhalai ke liye hai aur un muddo par qaum ke buzurgo aur ulema ke sath hai to samjhe ki qaum ek sahi raah par aage badh rahi hai; lekin agar jawan taish me aa kar koi mudde ko apne man se, aur baghair kisi buzurg / aalim ke hassasiyat dikha rahe hai aur use jeene ya marne ki baat samajh rahe hai, to samjhiye ki qaum ki leadership sahi hatho me hai hai aur future saaf nazar nahi aa raha hai.

13 रजब का जुलूस, मसला-ए-जैनाबिया और कौम के जवान



13 रजब का जुलूस, मसला-ए-जैनाबिया और कौम के जवान 



अगर हमें किसी कौम के जिंदा या मुर्दा होने की जांच करनी है तो देखना होगा की उसके जवान किन मुद्दों को ले कर हस्ससियत दिखा रहे है. अगर मुआशरे में जिन पॉइंट्स पर बात चल रही है वो कौम के भलाई के लिए है और उन मुद्दों पर कौम के बुज़ुर्ग और उलेमा साथ है तो समझे की कौम एक सही राह पर आगे बढ़ रही हैं; लेकिन अगर जवान तैश में आ कर कोई मुद्दे को अपने मन से, और बग़ैर किसी बुज़ुर्ग / आलिम की रहनुमाई के हस्ससियत दिखा रहे है और उसे जीने या मरने की बात समझ रहे है, तो समझिये की कौम की लीडरशिप सही हाथो में नहीं है और फ्यूचर साफ़ नज़र नहीं आ रहा है.

11 May 2015

Sayyad ki Ghair Sayyad se Shadi

“नस्ल और नसब की फजीलत सिर्फ तब है जब इंसान मुत्तकी हो, वरना नहीं!”

अल काफी में इमाम जाफ़र सादिक (अ) फरमाते है के जब रसुलेखुदा (स) ने मक्का फतह किया तो आप कोहे सफा पर तशरीफ़ लाए गए और फ़रमाया:

ऐ बनी हाशिम! ऐ बनी अब्दुल मुत्तलिब, मैं तुम्हारी तरफ अल्लाह का रसूल हूँ, और मैं तुम्हारा शफीक़ और दिल्सोज़ हूँ, मुझे तुम से मुहब्बत है – लिहाज़ा यह मत कहो के मुहम्मद (स) हम से हैं – अल्लाह की क़सम तुम (बनी हाशिम) में से और दीगर (काबिल ओ अक्वाम) में से मुत्तक़ीन के सिवा मेरा कोई दोस्त नहीं हैं.

जान लो; मैं तुम्हें रोज़े महशर नहीं पहचानुगा क्यों की तुम ने दुनिया की मुहब्बत को दोष पर स्वर किया होगा जब के दीगर लोगों ने आखिरत को दोष पर उठाया होगा.

याद रखो! मैंने अपने और तुम्हारे दरमियान, और अल्लाह और तुम्हारे दरमियान किसी किस्म का उज्र और बहाना नहीं छोड़ा – मेरे ज़िम्मे मेरा अमल है और तुम्हारे ज़िम्मे तुम्हारा अमल है.
(Al Kafi vol, 8, pg. 182, sifat us shia, hadith
Rijal ul Hadith: Is hadith k tamam Raavi SIQQA hein.

फवाएद अल हदीस:
इस्लाम ही वो वाहिद मज़हब है जो ज़ात पाक की नफी करते हुए तक्वा ओ परहेज़गारी को फजीलत ओ बरतरी की निशानी कहता है. किसी भी नस्ल को किसी नस्ल पर बरतरी हासिल नहीं है, मेयार खून और नस्ल नहीं बल्कि तक्वा और परहेज़गारी है. मोमिन मोमिन का कुफ़ है (हदीस-ए-रसूल (स)). लिहाज़ा कोई भी मोमिन किसी भी मोमिन से शादी कर सकता है, नस्ली बरतरी और ताफखुर की इस्लाम में कोई जगह नहीं!

सादात (सय्यद)का अह्तेराम उम्मती इस लिए करते हैं क्युकी इन को खानदाने इस्लाम से निस्बत है लेकिन सादात को बिला वजह ग़रूर का इज़हार नहीं करना चाहिए और न दीगर नस्लों को पस्त समझना चाहिए, बलकी इस निस्बत की वजह से इन पर बहोत बड़ी ज़िम्मेदारी आएद होती है. सादात को तक्वा और परहेज़गारी में बाकी सब से अफज़ल होना चाहिए, तब जा कर वो अपने आप को फख्रेयाब सादात कह सकते है.

हज़रत मीसमे तम्मार (र.अ), हज़रत सलमान फारसी (र.अ), हज़रत कंबर (र.अ), हजरत हबीब इब्ने मज़ाहिर (र.अ), बहोत सी अज्वाजे आइम्मः (अ), हजरत मुहम्मद बिन अबुबक्र (र.अ) और बे तहाशा मिसाले हमारे सामने है जो के सादात नहीं थे ना ही हाश्मी थे लेकिन तक्वा की उन मनाज़िल पर थे की खुद को सादात कह कर ग़रूर करने वाले उन के क़दमो की धुल तक के बराबर नहीं!

अब आप हजरात से सवालात ये हैं कि:
1.      क्या कुरान की कोई आयत ऐसी है जिस में हुक्म है के सय्यद का ग़ैर सय्यद से निकाह जायज़ नहीं?
2.      हज़रत अब्दुल मुत्तलिब की बेटी हज़रत जैनब (र.अ) हाश्मी हुई तो उन का निकाह रासुलेखुदा (स) ने अपने गुज़िश्ता ग़ुलाम और ग़ैर सय्यद हज़रत ज़ैद (र.अ) से क्यों करवाया?

(अव्वल तो हाश्मी और औलादे बीबी फातिमा (स) पर खुम्सो ज़कात के अहकामात एक है याने शरफ के लिहाज़ से दोनों एक तो यह मिसाल दी लेकिन अगर फिर भी कोई हाश्मी को सय्यद से अलग करे तो फिर मौला अली (अ) ने बीबी जैनब (अ) का अकड हज़रात अब्दुल्लाह (र.अ) जो के हाश्मी थे उन से क्यों किया?)

सुन्नत तो काएम हो गई कोई आंखे फिर बंद रखना चाहे तो कोई क्या करे?

3.      अब्दुल्लाह इब्ने जफ़र सादिक (अ), इस्माइल इब्ने जफ़र सादिक, जफ़र कज्जाब इब्ने इमाम अली नकी, वगैरह इन सब ने झूठा इमामत का दावा किया और जिन से आहादिस में आइम्माए तहिरिन (अ) ने बेजारी का इज़हार किया, तो क्या यह सय्यद होने की वजह से सुर्खरू हो जाएगे? या आइम्मा (अ) की बेजारी की वजह से पकड़ में आएँगे?

4.      “सलमान हमारे अहलेबैत में से है” – यह एक मशहूर हदीस है. ऐसा क्यूँ है की सय्यद ना होते हुए भी तक्वा के बाईस इस मंजिल पर है के अहलेबैत में शामिल कर लिया गया?

कुरान और हदीस की रौशनी में फतवात:
1.      अयातुल्लाह सिस्तानी सय्यद और ग़ैर सय्यद में निकाह को जायज़ करार देते है और इसे इस्लामी हुदूद में समझते है (Risalah, Book of Nikah, issue #221)

2.      अयातुल्लाह खामेनेई सय्यद और ग़ैर सय्यद में निकाह को जायज़ करार देते है और इसे इस्लामी हुदूद में समझते है (इस्तिफ्ता अयातुल्लाह खामेनेई)

3.      अयातुल्लाह खुई (र.अ): एक आज़ाद औरत का एक ग़ुलाम के साथ निकाह – हाश्मी औरत का ग़ैर हाश्मी से निकाह, एक अरब औरत का ग़ैर अरब से निकाह जायज़ है (Minhaj al-Saliheen (By Sayyid Abul Qasim al-Mousavi al-Khoei), vol. II , Kitab al -Nikah.)

इसके अलावा अयातुल्लाह गुल्पएगानी, अयातुल्लाह फजलुल्लाह, इमाम खोमीनी (र.अ),अयातुल्लाह मकारेम शिराज़ी, अल्लामा हिल्ली (र.अ), अल्लामा राज़ी (र.अ), शेख मुफीद (र.अ), शेख सदूक़ (र.अ), ग़रज़ यह की किसी भी आलिम ने सय्यद की ग़ैर सय्यद के साथ शादी से मन नहीं फ़रमाया है. 

मुखालिफिन की तरफ से दो जवाज़:
1.      इमाम मूसा काजिम (अ) की 18 / 20 बेटियां थी. जहाँ ये बात सच है की इमाम काजिम (अ) की बेटियों की शादियाँ नहीं हुई और शेख कुम्मी (र.अ) की किताब से इक्तेबास लिया जाता है की वहां यह बात सरहन बोहतान और झूट पर मबनी है की उन की शादियाँ इस लिए नहीं हुई क्युकी कोई सय्यद नहीं था; उस किताब में ये लिखा है की उनका कोई कुफ़ नहीं था और याद रहे की मोमिन मोमिन का कुफ़ है न की सय्यद सय्यद का और ग़ैर सय्यद ग़ैर सय्यद का! इस तरह की ग़लत बातें इमाम मूसा काजिम (अ) और इमाम रेज़ा (अ) से जोडने से पहले तारिख का बगौर मुतालिया कर लीजिये.

2.      दूसरी यह हदीस पेश की जाती है जो रसुल्लुल्लाह (स) ने इमाम अली (अ) और हज़रात जाफ़रे तैयार (अ) के बच्चो की तरफ देख कर कही:

“हमारी लड़कियां हमारे लड़कों के लिए है और हमारे लडकें हमारी लड़कियों के लिए” (Man La Yad harul Faqeeh, chapter nikkah, pg. 249)

तो अव्वल यह हदीस पूरी नस्ले सदात के लिए कही नहीं गई और सिर्फ इन खानदान के बीच शादियों के लिए सूरते हाल के मुताबिक कही गई मगर फिर भी कोई बज़िद हो तो क्या मौला अली (अ) ने बाद अज जनाबे फातिमा (स) बीबी उम्मुल बनीं से अकद नहीं किया? क्या इमाम हुसैन (अ) और इमाम हसन (अ) और दीगर आइम्मा (अ) ने ग़ैर सय्यद से शादी नहीं की? क्या नौज़ुबिल्लाह हमारे आइम्मा (अ) ने कौले रसूल (स) पर अमल नहीं किया?

लिहाज़ा किसी के लिए सय्यद होना शरफ की बात तब होंगी जब वो मुत्तकी होगा और जब कोई मुतक्की होता है तो खुदा के यहाँ अफज़ल हो जाता है और जातपात का पाबंद नहीं रहता.
बग़ैर अमल के यह निस्बत रोज़े महशर किसी का फाएदा नहीं दे सकती जैसा के ऊपर हदीस में साफ़ वज़ह है. नबी से निस्बत जोड़ने वाले लोगों का नामे आमाल रोज़े महशर खाली हो और हकूक उन नास की रियाअत भी न करते हो तो यकीनन यह लोग बाईस-ए-शर्मिंदगी बनेंगे लिहाज़ा खुदरा रिश्ते तलाश करते हुए तक्वे को मेयार बनाये न की ज़ात को.

“और बेशक अल्लाह की ज़ात को पाने के लिए अपनी ज़ात से निकलना होता है”

इस मौजु को मजीद जानने के लिए ये विडियो क्लिप ज़रूर देखे:

जवानों में भरोसा, एक दुसरे की इज्ज़त और इत्तेहाद की लगन कैसे बड़ाई जाए? जवानों में भरोसा, एक दुसरे की इज्ज़त और इत्तेहाद की लगन कैसे बड़ाई जाए?

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