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30 Aug 2026

Eid Milad un Nabi, Hafta e Wahdat aur Humari Qaum

​Ek Mubarak aur Khoobsurat Din…

17th Rabi-ul-Awwal

Jari Week of Unity ke dauran, Holy Prophet Muhammad (s.a.) aur Holy Imam Sadiq (a.s.) ki mubarak wiladat ka yeh din humein dawat deta hai ke hum apni soch ko wasee karein. Sirf apne aas-paas ke logon ke baare mein nahi, balki poori insaniyat ke baare mein sochein. Har us insaan ki kamyabi ke baare mein sochein jiske saath hum is duniya mein reh rahe hain, aur un aane wali naslon ke baare mein bhi jo hamare baad is duniya mein aayengi.

Yeh dono muqaddas hastiyan yaqeenan bahut mubarak hain, lekin saath hi tareekh ki sabse zyada mazloom hastiyon mein bhi shumar hota hai.

Nabi-e-Karim (s.a.) Rehmat-ul-lil-Aalameen bankar aaye. Lekin afsos, unke kuch pairvikaron ne unke paighaam ko sirf apne aqeede tak mahdood kar diya, khud ko hi wahid kamyab giroh sabit karne ki koshish ki aur doosron ko itna neecha samjha ke jaise unki zindagi ki koi ahmiyat hi na ho.

Isi tarah, woh Imam jo ilm ka sarchashma hain, jinhone Ummah ki is tarah rehnumai ki ke aaj koi bhi Musalman Imam Sadiq (a.s.) ki taleem aur Ahkaam se khud ko alag nahi kar sakta; jinhone apni ilahi rehnumai se mukhtalif Mazahib ke ilm ko parwan chadhaya — aaj unhi ke pairvikar ek doosre ko gumrah kehne aur sirf apne aap ko Allah ki taraf se hidayat-yafta sabit karne mein masroof hain.

Ek doosre ke baare mein badgumani aur nafrat apni inteha par hai, aur afsos ki baat yeh hai ke yeh sab kuch Deen-e-Muhammad (s.a.) aur Imam Sadiq (a.s.) ke mazhab ke naam par ho raha hai.

Isliye Unity sirf Juloos-e-Milaad mein shirkat karne, Ittehad par reels banane, do-chaar programs organize karne ya sharbat taqseem karne se haasil nahi hogi.

Unity insaniyat ki zaroorat hai — taaki hum ek doosre ke saath mil-jul kar reh saken, taraqqi kar saken aur haqeeqi kamyabi ki taraf badh saken.

Unity sirf ek slogan nahi hona chahiye, jise hum apni khwahish ko tasalli dene ke liye istemal karein ke hum un logon se alag hain jo nafrat phailate hain.

Jab hamare apne hi giroh ke kuch log Ahlulbait (a.s.) ke naam par Week of Hatered jaise bilkul mukhtalif aur nafrat bhare tasavvur ko shuru karne par tule hue hain, to ab waqt hai ke hum sochein:

Aakhir yeh muqaddas hastiyan humse kya chahti hain?

Humein chahiye ke hum unki taleemat ko samjhein aur insaniyat ki ijtimaai kamyabi ke liye milkar kaam karein — chahe woh samaji, maashi, roohani ya zindagi ke har pehlu ki kamyabi ho.

Yahi hamara asal maqsad aur United Goal hona chahiye.

Milaad-e-Nabi (s.a.) wa Imam Sadiq (a.s.) Mubarak!

💐💐💐


3 Nov 2016

रुसुमात और ओलेमा की बेहुरमती



"जब उनसे कहा जाता है की जो अल्लाह ने नाजिल किया है उसकी पैरवी करो; तो कहते है की नहीं! हम तो उसी तरीके से चलेगे जिस पर हमने अपने बाप दादाओ को पाया है" (31:21)

अल्लाह ने दीन को आसान और इंसानी तबियत (नेचर) के लिहाज़ से बनाया है, जिसमे तब्दीली इंसान के वुजूद के लिए खतरा साबित होती है. लेकिन ज़मीन और ज़माने के लिहाज़ से लोग अलग अलग किस्म की चीज़े दीन में दाखिल कर देते है जो शुरुवात में तो इतनी नुकसानदेह नज़र नहीं आती, लेकिन लम्बी मुद्दत में अवाम इसे दीन का हिस्सा बना लेती है. 

4 Oct 2015

ईद-ए-ग़दीर क्या है?


18 ज़िल्हज्ज की तारीख आते ही “ईद-ए-ग़दीर मुबारक” के मेसेज व्हाट्स अप पर आने लगते है; लेकिन इन मेसेज में ईद के बारे में कम और किसी दूसरी कौम / बिरादरी पर तंज़ ज्यादा नज़र आते है. क्या ईद-ए-ग़दीर की यही हकीक़त है की हम दुसरो पर अपने बढ़ावे को साबित करे या दुसरो को जहन्नुमी बता कर उन पर तंज़ कसे. क्या यही ग़दीर की हकीक़त है?

इसी सवाल के जवाब में जब मैंने ग़दीर के रोज़ के रसूले अकरम (स) के खुतबे पर नज़र की तो ऐसा कुछ नहीं मिला जिसमे हुजुर (स) ने दुसरो पर तंज़ कसा हो या किसी कौम का मज़ाक उड़ाया हो. बल्कि इसके उलट रसुलेखुदा (स) के दिल के अन्दर का लोगो का प्यार नज़र आया; जिसकी वजह से वो किसी भी चीज़ की परवाह किये बगैर अल्लाह का पैग़ाम लोगो तक पहुचने में जल्दी करते नज़र आए ताकि पैग़ामे खुदा लोगो तक पहुचे जिससे उन्हें राहे हक मिल जाए.

27 Jul 2015

बकी और क़ुद्स पर सियासत क्यों?



तहरीर: सय्यद नजीबुल हसन जैदी

 
सोशल मीडिया पर मेरी तरह आप की निगाहों से भी इस किस्म की पोस्ट ज़रूर गुजरी होगी “कहा है क़ुद्स का प्रोग्राम करने वाले? कहा है फिलिस्तीन की आज़ादी के लिए मुज़हेरे करने वाले? कहा है बैतूल मुक़द्दस के सिलसिले में जुलूस निकलने वाले? बाकी वीरान है, हमारे चार इमामो की क़ब्रे सुनसान है, लेकिन न क़ुद्स के जुलूस निकलने वालो की खबर है न फिलिस्तीन का दम भरने वालो का पता; क्या जन्नतुल बकी की अजमत और मज्लुमियत बैतूल मुक़द्दस से कम है जो आज इन्हेदामे जन्नतुल बकी पर वो लोग खामोश है जो क़ुद्स क़ुद्स करते घूमते है?

2 Jun 2015

जवानों में भरोसा, एक दुसरे की इज्ज़त और इत्तेहाद की लगन कैसे बड़ाई जाए?

जवानो में भरोसा, एक दुसरे की इज़्ज़त और इत्तेहाद की लगन कैसे बढ़ाई जाए?

हमारे पालनेवाले ने हमें एक दुनिया बनाकर उसमे एक साथ रहने के लिए पैदा किया. दुनिया इतनी बेहतरीन बनाया की इंसान इसे छोड़ने के लिए तैयार ही नहीं होता. कितनी भी उम्र हो जाए, इंसान को यहाँ थोड़े दिन और रहने का दिल करता है. लेकिन उसके उलट, अगर इसी दुनिया में हमारे किसी के साथ रिश्ते ख़राब हो जाए, या झगडा हो जाए तो यही दुनिया हमें काटने दौड़ती है. अगर झगडा किसी करीबी से हो तो हालात और ख़राब बन जाते है.

हमारी ज़िन्दगी को सुख और चैन से गुज़ारने में जो पॉइंट सबसे इम्पोर्टेन्ट है वो है लोगों के साथ मिल-जुल कर रहना. घर वालो के साथ साथ बहार वालो के साथ भी अच्छे अखलाक से पेश आना; फिर वो हमारे मज़हबो मसलक के हो या बहार वाले. 

12 May 2015

13 रजब का जुलूस, मसला-ए-जैनाबिया और कौम के जवान



13 रजब का जुलूस, मसला-ए-जैनाबिया और कौम के जवान 



अगर हमें किसी कौम के जिंदा या मुर्दा होने की जांच करनी है तो देखना होगा की उसके जवान किन मुद्दों को ले कर हस्ससियत दिखा रहे है. अगर मुआशरे में जिन पॉइंट्स पर बात चल रही है वो कौम के भलाई के लिए है और उन मुद्दों पर कौम के बुज़ुर्ग और उलेमा साथ है तो समझे की कौम एक सही राह पर आगे बढ़ रही हैं; लेकिन अगर जवान तैश में आ कर कोई मुद्दे को अपने मन से, और बग़ैर किसी बुज़ुर्ग / आलिम की रहनुमाई के हस्ससियत दिखा रहे है और उसे जीने या मरने की बात समझ रहे है, तो समझिये की कौम की लीडरशिप सही हाथो में नहीं है और फ्यूचर साफ़ नज़र नहीं आ रहा है.

11 May 2015

Sayyad ki Ghair Sayyad se Shadi

“नस्ल और नसब की फजीलत सिर्फ तब है जब इंसान मुत्तकी हो, वरना नहीं!”

अल काफी में इमाम जाफ़र सादिक (अ) फरमाते है के जब रसुलेखुदा (स) ने मक्का फतह किया तो आप कोहे सफा पर तशरीफ़ लाए गए और फ़रमाया:

ऐ बनी हाशिम! ऐ बनी अब्दुल मुत्तलिब, मैं तुम्हारी तरफ अल्लाह का रसूल हूँ, और मैं तुम्हारा शफीक़ और दिल्सोज़ हूँ, मुझे तुम से मुहब्बत है – लिहाज़ा यह मत कहो के मुहम्मद (स) हम से हैं – अल्लाह की क़सम तुम (बनी हाशिम) में से और दीगर (काबिल ओ अक्वाम) में से मुत्तक़ीन के सिवा मेरा कोई दोस्त नहीं हैं.

जान लो; मैं तुम्हें रोज़े महशर नहीं पहचानुगा क्यों की तुम ने दुनिया की मुहब्बत को दोष पर स्वर किया होगा जब के दीगर लोगों ने आखिरत को दोष पर उठाया होगा.

याद रखो! मैंने अपने और तुम्हारे दरमियान, और अल्लाह और तुम्हारे दरमियान किसी किस्म का उज्र और बहाना नहीं छोड़ा – मेरे ज़िम्मे मेरा अमल है और तुम्हारे ज़िम्मे तुम्हारा अमल है.
(Al Kafi vol, 8, pg. 182, sifat us shia, hadith
Rijal ul Hadith: Is hadith k tamam Raavi SIQQA hein.

फवाएद अल हदीस:
इस्लाम ही वो वाहिद मज़हब है जो ज़ात पाक की नफी करते हुए तक्वा ओ परहेज़गारी को फजीलत ओ बरतरी की निशानी कहता है. किसी भी नस्ल को किसी नस्ल पर बरतरी हासिल नहीं है, मेयार खून और नस्ल नहीं बल्कि तक्वा और परहेज़गारी है. मोमिन मोमिन का कुफ़ है (हदीस-ए-रसूल (स)). लिहाज़ा कोई भी मोमिन किसी भी मोमिन से शादी कर सकता है, नस्ली बरतरी और ताफखुर की इस्लाम में कोई जगह नहीं!

सादात (सय्यद)का अह्तेराम उम्मती इस लिए करते हैं क्युकी इन को खानदाने इस्लाम से निस्बत है लेकिन सादात को बिला वजह ग़रूर का इज़हार नहीं करना चाहिए और न दीगर नस्लों को पस्त समझना चाहिए, बलकी इस निस्बत की वजह से इन पर बहोत बड़ी ज़िम्मेदारी आएद होती है. सादात को तक्वा और परहेज़गारी में बाकी सब से अफज़ल होना चाहिए, तब जा कर वो अपने आप को फख्रेयाब सादात कह सकते है.

हज़रत मीसमे तम्मार (र.अ), हज़रत सलमान फारसी (र.अ), हज़रत कंबर (र.अ), हजरत हबीब इब्ने मज़ाहिर (र.अ), बहोत सी अज्वाजे आइम्मः (अ), हजरत मुहम्मद बिन अबुबक्र (र.अ) और बे तहाशा मिसाले हमारे सामने है जो के सादात नहीं थे ना ही हाश्मी थे लेकिन तक्वा की उन मनाज़िल पर थे की खुद को सादात कह कर ग़रूर करने वाले उन के क़दमो की धुल तक के बराबर नहीं!

अब आप हजरात से सवालात ये हैं कि:
1.      क्या कुरान की कोई आयत ऐसी है जिस में हुक्म है के सय्यद का ग़ैर सय्यद से निकाह जायज़ नहीं?
2.      हज़रत अब्दुल मुत्तलिब की बेटी हज़रत जैनब (र.अ) हाश्मी हुई तो उन का निकाह रासुलेखुदा (स) ने अपने गुज़िश्ता ग़ुलाम और ग़ैर सय्यद हज़रत ज़ैद (र.अ) से क्यों करवाया?

(अव्वल तो हाश्मी और औलादे बीबी फातिमा (स) पर खुम्सो ज़कात के अहकामात एक है याने शरफ के लिहाज़ से दोनों एक तो यह मिसाल दी लेकिन अगर फिर भी कोई हाश्मी को सय्यद से अलग करे तो फिर मौला अली (अ) ने बीबी जैनब (अ) का अकड हज़रात अब्दुल्लाह (र.अ) जो के हाश्मी थे उन से क्यों किया?)

सुन्नत तो काएम हो गई कोई आंखे फिर बंद रखना चाहे तो कोई क्या करे?

3.      अब्दुल्लाह इब्ने जफ़र सादिक (अ), इस्माइल इब्ने जफ़र सादिक, जफ़र कज्जाब इब्ने इमाम अली नकी, वगैरह इन सब ने झूठा इमामत का दावा किया और जिन से आहादिस में आइम्माए तहिरिन (अ) ने बेजारी का इज़हार किया, तो क्या यह सय्यद होने की वजह से सुर्खरू हो जाएगे? या आइम्मा (अ) की बेजारी की वजह से पकड़ में आएँगे?

4.      “सलमान हमारे अहलेबैत में से है” – यह एक मशहूर हदीस है. ऐसा क्यूँ है की सय्यद ना होते हुए भी तक्वा के बाईस इस मंजिल पर है के अहलेबैत में शामिल कर लिया गया?

कुरान और हदीस की रौशनी में फतवात:
1.      अयातुल्लाह सिस्तानी सय्यद और ग़ैर सय्यद में निकाह को जायज़ करार देते है और इसे इस्लामी हुदूद में समझते है (Risalah, Book of Nikah, issue #221)

2.      अयातुल्लाह खामेनेई सय्यद और ग़ैर सय्यद में निकाह को जायज़ करार देते है और इसे इस्लामी हुदूद में समझते है (इस्तिफ्ता अयातुल्लाह खामेनेई)

3.      अयातुल्लाह खुई (र.अ): एक आज़ाद औरत का एक ग़ुलाम के साथ निकाह – हाश्मी औरत का ग़ैर हाश्मी से निकाह, एक अरब औरत का ग़ैर अरब से निकाह जायज़ है (Minhaj al-Saliheen (By Sayyid Abul Qasim al-Mousavi al-Khoei), vol. II , Kitab al -Nikah.)

इसके अलावा अयातुल्लाह गुल्पएगानी, अयातुल्लाह फजलुल्लाह, इमाम खोमीनी (र.अ),अयातुल्लाह मकारेम शिराज़ी, अल्लामा हिल्ली (र.अ), अल्लामा राज़ी (र.अ), शेख मुफीद (र.अ), शेख सदूक़ (र.अ), ग़रज़ यह की किसी भी आलिम ने सय्यद की ग़ैर सय्यद के साथ शादी से मन नहीं फ़रमाया है. 

मुखालिफिन की तरफ से दो जवाज़:
1.      इमाम मूसा काजिम (अ) की 18 / 20 बेटियां थी. जहाँ ये बात सच है की इमाम काजिम (अ) की बेटियों की शादियाँ नहीं हुई और शेख कुम्मी (र.अ) की किताब से इक्तेबास लिया जाता है की वहां यह बात सरहन बोहतान और झूट पर मबनी है की उन की शादियाँ इस लिए नहीं हुई क्युकी कोई सय्यद नहीं था; उस किताब में ये लिखा है की उनका कोई कुफ़ नहीं था और याद रहे की मोमिन मोमिन का कुफ़ है न की सय्यद सय्यद का और ग़ैर सय्यद ग़ैर सय्यद का! इस तरह की ग़लत बातें इमाम मूसा काजिम (अ) और इमाम रेज़ा (अ) से जोडने से पहले तारिख का बगौर मुतालिया कर लीजिये.

2.      दूसरी यह हदीस पेश की जाती है जो रसुल्लुल्लाह (स) ने इमाम अली (अ) और हज़रात जाफ़रे तैयार (अ) के बच्चो की तरफ देख कर कही:

“हमारी लड़कियां हमारे लड़कों के लिए है और हमारे लडकें हमारी लड़कियों के लिए” (Man La Yad harul Faqeeh, chapter nikkah, pg. 249)

तो अव्वल यह हदीस पूरी नस्ले सदात के लिए कही नहीं गई और सिर्फ इन खानदान के बीच शादियों के लिए सूरते हाल के मुताबिक कही गई मगर फिर भी कोई बज़िद हो तो क्या मौला अली (अ) ने बाद अज जनाबे फातिमा (स) बीबी उम्मुल बनीं से अकद नहीं किया? क्या इमाम हुसैन (अ) और इमाम हसन (अ) और दीगर आइम्मा (अ) ने ग़ैर सय्यद से शादी नहीं की? क्या नौज़ुबिल्लाह हमारे आइम्मा (अ) ने कौले रसूल (स) पर अमल नहीं किया?

लिहाज़ा किसी के लिए सय्यद होना शरफ की बात तब होंगी जब वो मुत्तकी होगा और जब कोई मुतक्की होता है तो खुदा के यहाँ अफज़ल हो जाता है और जातपात का पाबंद नहीं रहता.
बग़ैर अमल के यह निस्बत रोज़े महशर किसी का फाएदा नहीं दे सकती जैसा के ऊपर हदीस में साफ़ वज़ह है. नबी से निस्बत जोड़ने वाले लोगों का नामे आमाल रोज़े महशर खाली हो और हकूक उन नास की रियाअत भी न करते हो तो यकीनन यह लोग बाईस-ए-शर्मिंदगी बनेंगे लिहाज़ा खुदरा रिश्ते तलाश करते हुए तक्वे को मेयार बनाये न की ज़ात को.

“और बेशक अल्लाह की ज़ात को पाने के लिए अपनी ज़ात से निकलना होता है”

इस मौजु को मजीद जानने के लिए ये विडियो क्लिप ज़रूर देखे:

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